गोकुला जाट औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध सहस्त्र किसान क्रान्ति के सूत्रधार थे। 01 जनवरी 1670 को वेदिक संस्कृति व स्वतंत्रता के लिए बलिदान हो गये - चौधरी अंजली आर्या

 


                                                                                                              कश्यप ज्योति समाचार पत्र                                             कार्यालय 50ए गांधी मार्केट मोदीनगर
                                दिनांक 01/01/2020
                                   जिला गाजियाबाद  मोदीनगर

आज गांव रोरी मे वीर गोकुला जाट का 351वा बलिदान दिवस मनाया गया।  दीप प्रज्ज्वलित कर  गोकुला जी के चित्र पर माला व पुष्प अर्पित किये।


चौधरण अंजली आर्या ने सभी को बताया समर वीर गोकुल जी का बलिदान दिवस मनाने का उद्देश्य यहां है कि हमारे बच्चे उनके त्याग, तप, पराक्रम व बलिदान से प्रेरणा लेकर देश व समाज में हो रहे अत्याचार से लडना सिखे । जो सत्य व धर्म के लिए लडता हुआ समर भूमि में मारा जाता है वो ही अमरत्व को प्राप्त होता है । उन्होंने औरंगजेब जैसे अत्याचारी शासक के विरुद्ध बगावत कर पुरे उत्तर भारत में सहस्त्र किसान क्रान्ति का बिगुल बजा दिया था और किसानों की एक सेना बना ली जिससे लड़ने के लिए मुगल सैनिक डरने लगे थे । गोकुला जाट की वीरता और साहस को देखकर औरंगजेब को स्वयम लड़ने के लिए दिल्ली छोड़कर मथुरा आना पड़ा । औरंगजेब की तोपों, हाथीयों व घुड़सवारों की विशाल सेना से गोकुला चार दिन तक युद्ध लडता रहा अन्त में उन्हें परिवार व हजारों किसानों सहित बंदी बना लिया गया। 01जनवरी1670 को आगरा के लालकिले में इस्लाम कबूल न करने पर साथीयों सहित जलादो से टुकड़े टुकड़े करके मरवा दिया गया। औरंगजेब की इस बर्बरता से पुरे ब्रज प्रदेश में  मुगलिया सल्तनत के खिलाफ नफरत की आग फैल गई और मुगलिया सल्तनत के समाप्त होने तक गोकुला के अनुयाई लड़ते रहे।


  सुमन चौधरी ने अपने उद्बोधन में कहा की गोकुल जाट एक किसान परिवार से थे उनके पास न कोई रियासत थी न कोई राज्य था। उन्होंने किसानों की सेना तैयार की जिसमें 20000 हजार  सैनिक थे। इसी सेना के दम पर उन्होंने औरंगजेब के आतंक को खत्म करने का संकल्प लिया। 
गोकुल का इसारा मिलते ही किसानों ने लगान देने बन्द कर दिया जिससे खफा होकर मुगलिया सैनिकों ने किसानों के घरों को लुटना शुरू कर दिया और पालतू पशुओं को छीनकर ले जाने लगे। गोकुला के नेतृत्व में किसानों ने मुगलों की छावनियों पर हमला करना शुरू कर दिया और मुगल फौजदार को मार दिया और पुरी छावनी को नष्ट कर दिया। 
 औरंगजेब इस खबर से क्रोधित होकर बड़ी सेना व भारी तोपों से तिलपत की गढी पर हमला कर नष्ट कर दिया। गढी को नष्ट होता देख कर जाट क्षत्राणियो ने पुरूषों के साथ मोर्चा संभाला और अंतिम समय तक गोकुला जाट के नेतृत्व में लडती रही तिलपत की लड़ाई में कुछ महिलाएं लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं और कुछ महिलाओं को अपना सतीत्व बचाने के लिए जौहर भी करना पड़ा।
लेकिन कितने दुख की बात है कि आज हिन्दू समाज हिन्दू वीर गोकुला को बिल्कुल भूल चुका हैं। उनकी पूरे देश मे एक आध जगह ही उनकी मूर्ति लगी होगी। उनके नाम पर सरकार ने कोई योजना भी नही चलाई है उनके नाम पर किसी सड़क का नाम भी नही रखा गया और स्कूली किताबों में भी उन्हें नही पढाया जाता है। 
इस अवसर पर सरोज देवी , चंचल श्योराण, तनू चौधरी, वर्षा बजाज, शशि कश्यप,  संजू चौधरी, नीतू धनकड़,  चौधरी गंगाराम, अमरजीत , अरूण,  अभीमन्यु श्योराण, आदि उपस्थित रहे।


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